Thursday, 16 August 2018

और एक युगपुरुष नहीं रहे


और एक युगपुरुष नहीं रहे ...........

आज तो दुश्मन भी रो पड़ेंगे..........

मैं जी भर जिया, 
मैं मन से मरूं, 

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं

क्यूँ व्यर्थ चिंतित हो, मैं यहीं था यहीं हूँ और यहीं रहूँगा।

मैं अटल हूँ मैं सत्य हूँ मैं सबके दिलों में रहूँगा।।





ठन गई मौत से ठन गई जूझने का मेरा इरादा न था मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था रास्ता रोक वह खड़ी हो गई यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई मौत की उमर क्या है?दो पल भी नहीं ज़िन्दगी सिलसिला,आज कल की नहीं मैं जी भर जिया,मैं मन से मरूँ लौटकर आऊँगा,कूच से क्यों डरूँ
भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपाई


भारतीय राजनीति के "राष्ट्रवाद युग" के सबसे चमकीले हस्ताक्षर को श्रद्धांजलि!

आज बात करते है देवों के देव, देवाधि देव महादेव के बारे में


आज बात करते है देवों के देव, देवाधि देव महादेव के बारे में 


भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य उतने ही विचित्र हैं। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज  हम आपको भगवान शिव से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें व इनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-

 क्यों हैं भगवान शिव की तीन आंखें?
Image result for mahadev trinetra
धर्म ग्रंथों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिव ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं। तीन आंखों वाला होने के कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस ज़रुरत है उसे जगाने की। भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञा चक्र का स्थान है। यह आज्ञा चक्र ही विवेक बुद्धि का स्रोत है। यही हमें विपरीत परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।

 शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं?
Related image
हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृग चर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं। भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्मी त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्मी धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

 भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल क्यों?
Related image
त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।

 क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा?
Image result for shiv aur chandrama
भगवान शिव का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है। भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला। चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है। चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए, दिमाग हमेशा शांत ही रखना चाहिए। यदि दिमाग शांत रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आएगा। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है। भगवान शिव का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिए। मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाएगी। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है।

भगवान शिव ने क्यों पीया था जहर?
Image result for shiv aur chandrama
देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र मंथन का अर्थ है अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना। मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना। हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे। यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है। शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिए। शिव द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।

 भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं बिल्व पत्र?
Image result for shivling belpatra
शिवपुराण आदि ग्रंथों में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है। 3 पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिव पूजन में उपयुक्त माना गया है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम। जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान शिव को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।

भगवान शिव को क्यों कहते श्मशान का निवासी?
Related image
भगवान शिव को वैसे तो परिवार का देवता कहा जाता है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं। भगवान शिव के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे लाइफ मैनेजमेंट का एक गूढ़ सूत्र छिपा है। संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का। भगवान शिव कहते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। क्योंकि ये संसार तो नश्वर है। एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है। इसलिए संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो।

भगवान शिव गले में क्यों धारण करते हैं नाग?
Related image
भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनका वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं। सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं। भगवान शिव उसे ही अपने साथ रखते हैं। भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं। देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता। नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है। जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है। कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है। इसलिए बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें।
 भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं भांग-धतूरा?
Related image
भगवान शिव को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं। आमजन इनका सेवन नशे के लिए करते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना। यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान को अर्पित करे दें और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें। ऐसा करने से भगवान की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।







Monday, 13 August 2018


देवघर स्काउट गाइड फ़ेलोशिप 
SHARAVNI MELA SERVICE
   श्रावणी मेला सेवा 



भारत स्काउट एंड गाइड फ़ेलोशिप हमेशा से अपने सेवा और जागरूकता के लिए देवघर में काफी प्रसिद्ध है, चाहे स्वछता अभियान हो या कुष्ठ या एड्स जैसे बिमारियों से अवगत  कराना और उनसे बचाओ के उपाय बताना



Image result for scout and guide fellowship india
बता दे, देवघर स्काउट एंड गाइड फ़ेलोशिप, इंडियन स्काउट गाइड फ़ेलोशिप के बहुत ही महत्वपूर्ण इकाई है, जो देश के अंतर्गत सारे कम्पों में भाग लेने के साथ साथ उचित योगदान भी देती है.



Image may contain: 6 people, outdoor

देवघर के श्रवणी मेला तो विश्व में प्रसिद्ध है और इस मेले में भारत स्काउट एंड गाइड फ़ेलोशिप के देवघर इकाई द्वारा किये कावरियों के सेवा 

Image may contain: 8 people, people standing and outdoor


Image may contain: 6 people, people standing and outdoor

पीछे 8 सालों से, हर श्रावणी मेला के प्रत्येक सोमवारी को,  देवघर स्काउट गाइड फ़ेलोशिप के सदस्य शिवभक्तों की सेवा के लिए तत्पर रहते है 
Image may contain: 10 people, including Rupali Sharma and Vivek Pandey, people smiling, people standing, child and outdoor


आज तृतीया सोमवारी को सिंघवा में कावंरियों के बिच श्रीमती नलिनी मुर्मू की अद्द्यक्ष्ता में भारत स्काउट एंड गाइड फ़ेलोशिप देवघर  काई के के सदस्य एवं बिजली विभाग के पदाधिकारी एवं कर्मचारी के सहयोग से रविवार रात ११:०० बजे से ठंडे पानी, निम्बू पानी, चाय, फल आदि का वितरण कर कावंरियों की सेवा की 



Image may contain: 4 people, people standing and outdoor


  साथ ही साथ घायल कवान्रियों के प्राथमिक उपचार भी किये गए 
 गर्म पानी से कावरियों के पैर भी धोये गए 

Image may contain: 6 people, including Subhash Pandit, people standing and outdoor
 के जिसमे भारत स्काउट एंड गाइड के देवघर इकाई के सदस्य एवं मोह्हले वासी ने काफी श्रद्धा पूर्वक बढ़ चढ़ के सहयोग प्रदान किया, जिसमे सुभाष पंडित, अरुणिमा शर्मा,विवेक पांडेय, रोहित पंडित, राजा, रुपाली शर्मा, पवन कुमार, प्रीतम कुमार, मिथिलेश कुमार, रजत कुमार, सुभम प्रसाद, आफताब, रोहन शर्मा, दिलीप, राजेश,कुमार अविनव, रजत,कौशल सहित कई  भारत स्काउट गाइड फ़ेलोशिप के सदस्य थे, 


 साथ ही साथ बिजली विभाग से शुभंकर झा, अमित भगत, परबगातेश्वर तिवारी, घनश्याम झा, अजय, शम्भु सिंह, प्रीतम भारती,आदि ने भी पूर्ण सहयोग दिया

बता दे की इन के द्वारा पहली  और दूसरी सोमवारी को जलसार (चिल्ड्रन पार्क), हनुमान टिकरी के पास कावंरियों की सेवा की गयी थी 





Saturday, 11 August 2018

शिव के तीसरी नेत्र से उत्पन्न " कृतमुख ", जिसने  खुद को ही खा लिए


Related image

भूख लगने पर व्यक्ति को भोजन के अलावा और कुछ नहीं सूझता है। इस समय बस यही चाहत रहती है कि जल्दी से कुछ मिल जाए जिसे खाकर भूख मिटायी जा सके। लेकिन अगर कोई भूख लगने पर अपने हाथ-पांव और पूरे शरीर को खा जाए तो इसे क्या कहिएगा।
इसे बस एक नाम से पुकारा जा सकता है 'कृतमुख'। Related image
भगवान शिव ने यही नाम दिया था उस देवता को जिसने भूख को मिटाने के लिए अपने ही अंगों को खा लिया था। 

शिव पुराण एवं स्कंद पुराण में कृतमुख देवता की चर्चा मिलती है। इनके विषय में कथा है कि एक बार एक राक्षस ने देवताओं को पराजित कर दिया और उन्हें स्वर्ग से निकालकर स्वयं इन्द्र बन बैठा। इसके बाद वह कैलाश पर्वत पर पहुंचकर भगवान शिव से पार्वती को उसे सौंप देने के लिए कहा। भगवान शिव इससे बहुत क्रोधित हुए और अपनी तीसरी नेत्र से एक राक्षस को उत्पन्न किया। यह राक्षस भूख का प्रतीक था। शिव जी ने अपनी नेत्रों से उत्पन्न राक्षस से कहा कि वह पहले राक्षस को खा जाए। 

शिव द्वारा उत्पन्न राक्षस को देखकर पहला राक्षस भयभीत हो गया और शिव जी से प्राणों की रक्षा की याचना करने लगा। शिव जी ने राक्षस को क्षमा कर दिया और अपने राक्षस से कहा कि उसे नहीं खाए। इस पर शिव जी का राक्षस कहने लगा कि उसे बहुत भूख लगी है। 

अगर वह इस राक्षस को नहीं खाएगा तो उसकी भूख कैसे शांत होगी। इस पर शिव जी ने उसे अपने ही हाथ-पांव एवं शरीर को खाने के लिए कह दिया। शिव के अदेश से राक्षस अपने ही शरीर को खा गया। 

इसके बाद भगवान शिव ने अपने नेत्र से उत्पन्न राक्षस को वरदान दिया कि अब से तुम कृतमुख नाम के देवता के रूप में पूजे जाओगे। जहां भी पार्थिव शिवलिंग की पूजा होगी वहां मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी। 

Image result for कृतमुख'।
शिव के वरदान के कारण कृतमुख और भगवान शिव पर अर्पित अक्षत से कृतमुख की भूख शांत होती है। घर में खुशहाली और अन्न-धन की वृद्घि के लिए पार्थिव शिव के साथ कृतमुख की भी पूजा करनी चाहिए। 

Friday, 10 August 2018




                  रावण के मूत्र से बना तालाब!

Related image

रावण भगवान भोलेनाथ का भक्त था यह तो सभी जानते हैं लेकिन रावण की भक्ति बड़ी ही विचित्र थी। वह भगवान भोलेनाथ को अपनी भक्ति की सीमा में बांधकर रखना चाहता था। इसके लिए रावण ने कई उपाय किए पर भगवान भोलेनाथ भला एक के होकर कैसे रह सकते थे इसलिए रावण का हर दांव खाली गया।

जब रावण निराश होकर अपने सिर की बलि चढ़ाने लगा तो शिव प्रकट हुए और रावण के साथ लंका जाने के लिए तैयार हो गए। लेकिन शर्त रख दी कि मैं तुम्हारे साथ लिंग रूप में चलूंगा। यह लिंग तुम जहां रख दोगे मैं वहीं पर विराजमान हो जाउंगा।
Image result for Ravana cutting head
रावण को अपने बाहु बल का बड़ा अभिमान था उसने सोचा कि शिवलिंग कितना भारी होगा इसे उठाकर में सीधा लंका ले जाऊंगा, यही सोचकर इसने शिव जी की शर्त झट से स्वीकार कर ली।

भगवान विष्णु ने देखा कि रावण शिव जी को लेकर लंका जा रहा है तो उन्हें जगत की चिंता सताने लगी। भगवान विष्णु बालक के रूप में रावण के सामने प्रकट हो गए। इसी समय रावण को लघु शंका लगी और उसने बालक बने विष्णु से अनुरोध किया कि शिवलिंग को अपने हाथों में थाम कर रखे, जब तक कि वह लघु शंका करके आता है।

रावण के पेट में गंगा समा गयी थी इसलिए वह लंबे समय तक मूत्र विसर्जन करता रहा। इसी बीच बालक बने विष्णु ने शिवलिंग को भूमि पर रख दिया और शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। रावण जब मूत्र त्याग करने के बाद लौटा तो भूमि पर रखे शिवलिंग को देखकर बालक पर बहुत क्रोधित हुआ। लेकिन वह कर भी क्या सकता था।
Related image
रावण ने शिवलिंग को उखाड़ने का पूरा प्रयास किया लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। क्रोध में भरकर रावण ने शिवलिंग के पैर पर एक लात मारी जिससे शिवलिंग भूमि में धंस। यह शिवलिंग झारखंड में स्थित बाबा बैद्यनाथ हैं।
Image result for Deoghar shivling

मंदिर के पास एक तालाब है जिसमें तीर्थयात्री स्नान करके बाबा को जल चढ़ाते हैं। इसी तालाब के पास दूसरा तालाब है जिसमें कोई स्नान या आचमन नहीं करता है क्योंकि इसे रावण के मूत्र से बना तालाब माना जाता है।
Related image

आखिर क्यों बाबा बैद्यनाथ धाम की पूजा  मानी जाती है अधूरी ???

Image result for Basukinath

देवघर, झारखण्ड के देवघर जिला स्थित द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक बाबा बैद्यनाथ धाम में जो कांवडी़या जलाभिषेक करने आते हैं , बासुकीनाथ मंदिर में भी जलाभिषेक करना नहीं भूलते।



मान्यता है कि जब तक बासुकीनाथ मंदिर में जलाभिषेक नहीं किया जाता तब तक बाबा बैद्यनाथ धाम की पूजा अधूरी रहती है।
Image result for Basukinath

बासुकीनाथ मंदिर, बाबा बैद्यनाथ धाम से करीब 42 किलोमीटर दूर दुमका जिले में स्थित है। बाबा बैद्यनाथ मंदिर स्थित कामना लिंग पर जलाभिषेक करने आए कांवडी़ये अपनी पूजा को पूर्ण करने के लिए बासुकीनाथ मंदिर में जलभिषेक जरूर करते हैं। कांवडी़ये अपने कांव़ड में सुल्तानगंज में बहती गंगा नदी से जो दो पात्रों में जल लाते हैं उसमें से एक का जल बाबा बैद्यनाथ में चढ़ाते हैं तो दूसरे को बाबा बासुकीनाथ पर अर्पित करते हैं।
कामना लिंग पर जलाभिषेक के बाद कई कांवडी़ये तो पैदल ही बासुकीनाथ धाम पहुंचते हैं परंतु अधिकांश कांवडी़ये फिर वाहनों द्वारा यहां तक की यात्रा करते हैं।
किंवदंतियों के मुताबिक प्राचीन समय में बासुकी नाम का एक किसान जमीन पर हल चला रहा था तभी उसके हल का फाल किसी पत्थर के टुक़डे से टकरा गया और वहां दूध बहने लगा। इसे देखकर बासुकी भागने लगा तब आकाशवाणी हुई, “तुम भागो नहीं मैं शिव हूं, मेरी पूजा करो।” तभी से यहां पूजा होने लगी।
कहा जाता है कि उसी बासुकी के नाम पर इस मंदिर का नाम बासुकीनाथ धाम प़डा।
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि बाबा बैद्यनाथ के दरबार में अगर दीवानी मुकदमों की सुनवाई होती है तो बासुकीनाथ में फौजदारी मुकदमे की सुनवाई होती है।
बासुकीनाथ मंदिर के पुजारी पंडित विजय झा के मुताबिक बासुकीनाथ में शिव का रूप नागेश का है। वह बताते हैं कि यहां पूजा में अन्य सामग्रियां तो चढ़ाई ही जाती हैं परंतु यहां दूध से पूजा करने का काफी महत्व है।
मान्यता है कि नागेश के रूप के कारण दूध से पूजा करने से भगवान शिव शंकर खुश रहते हैं। वह कहते हैं कि शिव के गले में लिपटे नाग को भी दूध पसंद होता है। उन्होंने बताया कि वर्ष में यहां एक बार महारूद्राभिषेक का आयोजन किया जाता है जिसमें काफी मात्रा में दूध चढ़ाया जाता है। उस दिन यहां दूध की नदी सी बह जाती है। वैसे इस रूद्राभिषेक में घी, मधु तथा दही का भी प्रयोग किया जाता है परंतु दूध ब़डी मात्रा में चढ़ाया जाता है। इस अनुष्ठान के समय भक्तों की भारी भी़ड इकट्ठी होती है। उन्होंने बताया कि बासुकीनाथ मंदिर में पूजा नहीं करने वालों की बाबा बैद्यनाथ धाम की पूजा अधूरी मानी जाती है।
यही कारण है कि सावन में यहां श्रद्धालुओं की भारी भी़ड इकटी हो जाती है।



Thursday, 9 August 2018

       परम शिवभक्त दशानन रावणImage result for ravan

10. रावण को लेकर आज भले चाहे जो माना जा रहा हो लेकिन वह बहुत बड़ा और अच्छा राजा माना जाता था, रावण की लंका में उसके राज्यवाले बहुत ज्यादा खुश रहते थे। आपको ज्ञात तो इसी कारण भगवान राम ने लक्ष्मण को भेजा था उसके पास राजनीति के टिप्स लेने को। यही नहीं उसकी सोने की लंका में किसी को कोई भी कष्ट नहीं था। रावण की प्रजा उससे खुश और संतुष्ट थी।9. यही नहीं रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने भी रावण को भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त और उनके अच्छे गुणों के बारे में काफी लिखा है।Image result for ravan
8. रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ बहु-विद्याओं का जानकार था।
7. देश के कम ही लोग हैं जो यह जानते हैं कि मध्यप्रदेश के मंदसौर सहित देश के कई कोनों में रावण पूजा उसकी अच्छाईयों के कारण किया जाता है।Image result for ravan
6. रावण को मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसने युद्ध के दौरान राम को बहुत बार छकाया था।
Image result for ravan
5. रावण बहुत बड़ा पंडित था और इसी कारण भगवान राम ने उससे विजय यज्ञ करवाया था। रावण ने शिवतांडव स्त्रोत की रचना की, जो आज भी शिव अराधना का सबसे बड़ा मंत्र माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार रावण को कई भाषाओं का ज्ञान था।Image result for ravan
4. रावण को लोग बहुत बढ़िया कवि कहते थे, उसने कई रचनाएं भी लिखी हैं। रावण ने तांडव स्तोत्र, अंक प्रकाश, इंद्रजाल, कुमारतंत्र, प्राकृत कामधेनु, प्राकृत लंकेश्वर, ऋग्वेद भाष्य, रावणीयम, नाड़ी परीक्षा आदि पुस्तकों की रचना की थी।
3. रावण को शिव का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद भगवान शिव ने कही थी कि रावण बहुत बड़ा शिवभक्त है, उसकी भक्ति पर भगवान राम को भी शक नहीं था।Image result for ravan
2. बहन सूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए रावण ने सीताहरण किया था। उसके पीछे रावण का तर्क था कि वह भाई का धर्म निभा रहा है। उसने वो ही किया जो एक भाई को करना चाहिए। लेकिन उसका तरीका गलत था।Image result for ravan
1. रावण ने सीता का अपहरण जरूर किया था लेकिन उसने कभी भी अपने पौरूष का गलत फायदा नहीं उठाया, उन्होंने दो साल तक सीता को बंदी बनाये रखा लेकिन कभी भी सीता को हाथ नहीं लगाया। रावण ने सीता के सामने उन्हें पत्नी बनाने के लिए हमेशा याचना ही की।